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यो꣢ नः꣣ स्वो꣡ऽर꣢णो꣣ य꣢श्च꣣ नि꣢ष्ट्यो꣣ जि꣡घा꣢ꣳसति । दे꣣वा꣡स्तꣳ सर्वे꣢꣯ धूर्वन्तु꣣ ब्र꣢ह्म꣣ व꣢र्म꣣ ममान्त꣢꣯र꣣ꣳ श꣢र्म꣣ व꣢र्म꣣ म꣡मा꣢न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥

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स्वर-रहित-मन्त्र

यो नः स्वोऽरणो यश्च निष्ट्यो जिघाꣳसति । देवास्तꣳ सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरꣳ शर्म वर्म ममान्तरम् ॥१८७२॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः꣢ । नः꣣ । स्वः꣢ । अ꣡रणः꣢꣯ । यः । च꣣ । नि꣡ष्ट्यः꣢꣯ । जि꣡घा꣢꣯ꣳसति । दे꣣वाः꣢ । तम् । स꣡र्वे꣢꣯ । धू꣣र्वन्तु । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् । श꣡र्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥

सामवेद » - उत्तरार्चिकः » मन्त्र संख्या - 1872 | (कौथोम) 9 » 3 » 8 » 3 | (रानायाणीय) 21 » 1 » 8 » 3


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अगले मन्त्र में वधेच्छु के विनाश का उपाय दर्शाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः -

(यः) जो (नः) हमें (स्वः) अपना दुर्भाव, (अरणः) पराया दुर्भाव, (यः च) और जो (निष्ठ्यः) शत्रु का दुर्भाव (जिघांसति) नष्ट करना चाहता है, (तम्) उस काम-क्रोध आदि दुर्भाव का (सर्वे) सब (देवाः) दिव्यगुण वा सदाचारी विद्वान् जन (धूर्वन्तु) वध कर दें। (ब्रह्म) महान् जगदीश्वर (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए, (शर्म) जगदीश की शरण (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए ॥३॥

भावार्थभाषाः -

कभी मनुष्य निज मन से उत्पन्न पाप में प्रवृत्त होता है और कभी परिचित जन से प्रेरित वा शत्रु से प्रेरित पाप में लिप्त होता है। दिव्य विचारों से, विद्वानों के सङ्ग से और परमेश्वर के ध्यान-चिन्तन से उन पापों को नष्ट करके वह निष्पाप और सच्चरित्र हो सकता है ॥३॥

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संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथ जिघांसोर्विनाशोपायं दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः -

(यः नः) अस्मान् (स्वः) स्वकीयो दुर्भावः, (अरणः) परकीयो दुर्भावः। [अरणः अपार्णो भवति। निरु० ३।२।] (यः च निष्ठ्यः) शत्रोः दुर्भावः (जिघांसति) हन्तुमिच्छति, (तम्) कामक्रोधादिकं दुर्भावम् (सर्वे) समस्ताः (देवाः) दिव्यगुणाः, सदाचारिणो विद्वांसो जना वा (धूर्वन्तु) हिंसन्तु। [धुर्वी हिंसार्थः, भ्वादिः।] (ब्रह्म) महान् जगदीश्वरः (मम) मदीयम् (अन्तरम्) मध्ये भवम् (वर्म) कवचम् रक्षासाधनम् अस्तु, (शर्म) जगदीशशरणम् (मम) मदीयम् (अन्तरम्) मध्ये भवम् (वर्म) कवचम् रक्षासाधनम् अस्तु ॥३॥२

भावार्थभाषाः -

कदाचिन्मनुष्यः स्वमनोभवे पापे प्रवर्तते कदाचिच्च परिचितजनप्रेरिते शत्रुप्रेरिते वा पापे लिप्यते। दिव्यविचारैर्विद्वत्सङ्गेन परमेश्वरानुध्यानेन च तानि पापानि विनाश्य स निष्पापः सच्चरित्रश्च भवितुं शक्नोति ॥३॥